मंगलवार, नवंबर 03, 2026

💞 मोहब्बत की सौगात 💞



    





   

बीता है एक लम्हा अभी

लम्हा-लम्हा बीतेगी जिंदगी भी

पलकों पर सजे हैं जो सपने

भर रही हूँ रंग उनमें 

कुछ जिन्दगी की हकीकत के

कुछ प्रेम की अनुभूति के


कभी महक जाती हूँ, कभी सिमट जाती हूँ

तेरे साथ बिताए गए पलों को याद करके 

तेरी आँखों से निकलते तीर

मेरे लिए काम देव बन जाते है

खफा होना भी चाहूँ मैं अगर 

हर बार ये तीर मेरी हार बन जाते है


मोहब्बत क्या है ये मुझे मालूम नही 

मगर तुझसे एक पल की दूरी

मुझे सदियों की सजा लगती हैं

सामने आए तू, तो शायद ना बता पाऊं 

मोहब्बत को अपनी ना जता पाऊं 


मगर मेरे सीने में हर वक्त तेरी ही तस्वीर रहती है। 

हूँ मैं तेरी, दिल की धड़कन ये पल-पल कहती है 

तू ही बता अपनी इस तड़प को कहाँ छुपाऊं 

भला तेरी मोहब्बत की सौगात को मैं कैसे पाऊं 


✍️ अंजुलिका खोखर ( उत्तर पूर्वी, दिल्ली )

💞 प्यार मोहब्बत का जमाना 💞









तेरी गली में आना जाना बहुत रहा 

वो प्यार मोहब्बत का जमाना बहुत रहा


इंतज़ार में दिन, आँखों में सारी रातें

ऐसे भी रोज साथ निभाना बहुत रहा


शाने पे तेरे रोना, तुझ बिन न चैन पाना

सारे जहां में ये अफ़साना बहुत रहा


वफ़ा, इंतज़ार, ऐतबार, शिकायत रोज-रोज 

मेरा भी तुमको रोज मनाना बहुत रहा


चर्चा का विषय मोहल्ले में सबके बीच था

कुमार भी तेरे लिए दीवाना बहुत रहा 


✍️ डॉ० कुमार धीरेन्द्र ( अल्मोड़ा, उत्तराखंड )

💑 संगति 💑









जीवन में संगति बड़ी, रखती अपना मान।
अच्छी संगति मान दे, बुरी करे अपमान॥

सत्संगति अमृत-घट, मन में भरे प्रकाश।
सदविचार जीवन सँवारें, मिटे हृदय की प्यास॥

अच्छी संगति गंग सम, निर्मल करती चित्त।
बुरी संगति नाले सम, मैला करती चित्त॥

कोयले की संगति से, सीखो जीवन-सार।
गर्म मिले तो हाथ जले, कालिख लगे अपार॥

जैसी संगति कीजिए, वैसा पड़े प्रभाव।
सत्संगति सुख बाँटती, कुसंगति दे घाव॥

मित्र वही जो राह में, दे सदमार्ग का ज्ञान।
कुसंगति में पड़कर नित, खोता मत सम्मान॥

संगति से बनता चरित्र, संगति से व्यवहार।
अच्छे गुण अपनाइए, जीवन हो उजियार॥

कोयला तपता आग में, हाथ जलाए साथ।
ठंडा होकर भी करे, काला अपना हाथ॥

संगति चुनिए सोचकर, रखिए मन में ज्ञान।
सही-गलत पहचानकर, बढ़े मनुज की शान॥

सज्जन का सान्निध्य ही, जीवन का उपहार।
सत्य, प्रेम, सदभाव से, महके घर-संसार॥

संगति का सम्मान कर, चुनिए उचित विचार।
अच्छे कर्मों से बने, जीवन सुखद अपार॥


✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

🌸 यदि वह लहू पुरुष का बहता...🌸









यदि विधाता सृष्टि का वह नियम बदल देता,

नारी का वह मासिक क्रंदन, पुरुष की झोली में धर देता,

तो अहंकार की दीवारों में शायद कोई दरार होती,

दर्द जिसे हम कमज़ोरी कहते, उसकी सही पहचान होती।


अगर विधाता पुरुषों को भी यह माहवारी थमा देते,

नारी की वो मासिक उलझन आदमी को समझा देते,

तो सच मानो इस दुनिया का सारा नज़रिया बदल जाता,

आज जो दर्द 'मूडस्विंग' कहलाता, वो राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता।


जो पैड्स आज छुपकर बिकते हैं काली पन्नियों के अंदर,

वो सजते मेडिकल स्टोरों पर, जैसे कोई परचम हो सुंदर।

सड़कों पर बैनर लग जाते, टीवी पर विज्ञापन आते,

"पुरुषों का गौरव है यह" कह, सब सीना तान के बतलाते।


करवट लेने पर जो पेट में उठती एक तीखी सी ऐंठन,

तो समझ आता पुरुष को, क्या होती है तन की टूटन।

नारी के उस मूक सब्र का, तब जाकर सम्मान होता,

यह कुदरती चक्र बिमारी कहकर यूँ ही बदनाम ना होता।


ना कोई अछूता कहता उनको, ना पूजा करने से रोकता,

ना रसोई के बाहर कोई, उनको बैठने को टोकता।

तब समझ में आता, यह दाग नही, एक सृजन है,

बिना किसी हिंसा बहता, यह जीवन का ही स्पंदन है।


तब समझता संसार, वह कमज़ोर नही ; शक्तिरूप है,

जो हर महीने सहती चुपचाप, एक तपती हुई धूप है।

सृष्टि के इस पावन चक्र को तब मस्तक सजाया जाता,

नारी शक्ती समर्थ रहती, यदि वह लहू पुरुष का बहता। 


✍️ अमोल बारई ‘कविमोल’ ( ठाणे, महाराष्ट्र )

सोमवार, नवंबर 02, 2026

🙇 मोबाइल की चमक में खो रहा बच्चों का बचपना 🙇

हम लोगों के बचपन के दौर में बच्चों के हाथों में कॉमिक्स, बाल पत्रिकाएं और उपन्यास दिखाई दिया करते थे। गर्मियों की छुट्टियों में कहानी की किताबें पढ़ना, पंचतंत्र की कथाओं से सीख लेना और चाचा चौधरी, नंदन, चंपक जैसी बाल पत्रिकाओं के किरदारों के साथ कल्पना की दुनिया में खो जाना बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा हुआ करता था किन्तु डिजिटल दौर में तस्वीर बिल्कुल बदल गई है। अब किताबों की जगह स्मार्टफोन ने ले ली है और पढ़ने की आदत पर शॉर्ट वीडियो का आकर्षण युवा पीढ़ी पर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। "मोबाइल और इंटरनेट ने जहां ज्ञान की दुनिया को बच्चों की उंगलियों तक पहुंचा दिया है, वहीं बिना निगरानी के अत्यधिक स्क्रीन समय और लगातार शॉर्ट वीडियो देखने की आदत अभिभावकों और शिक्षकों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।"

कुछ ही सेकंड में बदलते वीडियो बच्चों का ध्यान तेजी से आकर्षित करते हैं। इसके कारण लंबे समय तक किताब पढ़ने, किसी विषय पर एकाग्र होकर सोचने और धैर्यपूर्वक सीखने की आदत निरन्तर प्रभावित होती जा रही है। किताबों से मिलता है गहराई वाला ज्ञान बाल साहित्य केवल एक मनोरंजन का साधन नही था, बल्कि बच्चों में भाषा, कल्पना, तर्क, संवेदनशीलता और सामाजिक मूल्यों को विकसित करने का माध्यम भी रहा है। कहानी और उपन्यास पढ़ते समय बच्चा पात्रों के व्यवहार, परिस्थितियों और उनके निर्णयों को समझता है। 

इससे उसकी कल्पनाशक्ति विकसित होती है और वह किसी विषय को विस्तार से समझने का प्रयास करता है जबकि इसके विपरीत लगातार छोटे-छोटे वीडियो देखने की आदत में सामग्री तेजी से बदलती रहती है। स्मार्टफोन अथवा सोशल मीडिया वाले शॉर्ट वीडियो में उपलब्ध प्रत्येक सामग्री बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं होती। मनोरंजन के नाम पर ऐसे वीडियो भी कभी-कभी सामने आ सकते हैं जिनमें अभद्र भाषा, अनुचित व्यवहार, हिंसक दृश्य या दिखावे को बढ़ावा देने वाली सामग्री रहती हो। 

कम उम्र के बच्चे कई बार सही और गलत सामग्री के बीच अंतर नही कर पाते जिसके दुष्परिणाम अक्सर हमें देखने को मिलते हैं। "ऐसे में शिक्षकों के साथ ही अभिभावकों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।" बच्चों को पूरी तरह मोबाइल से दूर करने के बजाय उनके स्क्रीन समय, देखी जाने वाली सामग्री और ऑनलाइन गतिविधियों पर उम्र के अनुसार निगरानी रखना बहुत जरूरी है ताकि उनमें मोबाइल नही बल्कि पढ़ने की आदत बने। शिक्षकों और अभिभावकों का मानना है कि बच्चों के दैनिक जीवन में किताबों के लिए निश्चित समय होना चाहिए। घर में माता-पिता स्वयं किताब पढ़ेंगे तो बच्चों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। स्कूलों में बाल पुस्तकालय, कहानी पाठ, पुस्तक चर्चा और रचनात्मक लेखन जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देकर बच्चों को फिर से किताबों से जोड़ा जा सकता है।

बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह काटना आज के डिजिटल युग में व्यावहारिक समाधान नही है। "जरूरत इस बात की है कि मोबाइल ज्ञान का साधन बने, आदत का मालिक नही।"

डिजिटल शिक्षा के साथ पुस्तकों का संतुलन बनाकर ही बच्चों के ज्ञान, व्यवहार और व्यक्तित्व का बेहतर विकास किया जाना सम्भव हो सकता है।

विशेषज्ञों की सलाह-डिजिटल अनुशासन जरूरी बाल मनोविज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों की उम्र और जरूरत के अनुसार स्क्रीन टाइम निर्धारित करना, सोने से पहले मोबाइल से दूरी रखना, भोजन के समय फोन न देना तथा प्रतिदिन पढ़ने और खेलकूद के लिए समय तय करना इस दिशा में एक उपयोगी कदम साबित हो सकता हैं। 

                सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि बच्चों को केवल मोबाइल मत चलाओ कहने के बजाय उन्हें पढ़ने, खेलने, बातचीत करने और रचनात्मक गतिविधियों के बेहतर विकल्प दिए जाएं। "आज जरूरत मोबाइल छीनने की नही, बल्कि बच्चों को मोबाइल और किताब के बीच सही संतुलन सिखाने की है।" क्योंकि किताबें उनके भीतर सोच पैदा करती हैं और सही डिजिटल मार्गदर्शन उन्हें आधुनिक दुनिया के लिए तैयार करता है।


✍️ पंकज कुमार सिंह चौहान ( इटावा, उत्तर प्रदेश )

🌟 इको फ्रेंडली दीपावली 🌟











पटाखों से वायु होती है प्रदूषित 

यह सन्देश जन-जन तक पहुँचाए 

मानव होने का दायित्व निभाएं

वायु को प्रदूषण से मुक्त कराएं

आओ ! इको फ्रेंडली दीपावली मनाएं 


जग-मग करते मिट्टी के दिये जलाये 

रंग-बिरंगी रंगोली से द्वार सजाये

एक दूसरे को मिठाई खिलाएं

स्वस्थ अच्छी आदतों को अपनाएं 

आओ ! इको फ्रेंडली दीपावली मनाएं


जूठे खाने को फेंके नही

उससे कम्पोस्ट खाद बनाएं 

प्रकृति के चेहरे पर मुस्कान लाएं 

पर्यावरण संरक्षण का धर्म निभाएं 

आओ ! इको फ्रेंडली दीपावली मनाएं


पेड़-पौधे लगाकर धरती को

हरियाली की चादर ओढ़ाएं 

वातावरण की मुस्कान लौटाएं 

धरती को रहने लायक बनाएं 

आओ ! इको फ्रेंडली दीपावली मनाएं


मिट्टी से बनी मूर्तियां घर लाएं 

कपड़े के थैलो का इस्तेमाल बढ़ाये

डिस्पोजेबल बंद करने का अभियान चलाए 

पर्यावरण अनुकूल जीवन शैली अपनाएँ 

आओ ! इको फ्रेंडली दीपावली मनाएं


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

👨‍🏫 शिक्षक का मन 👨‍🏫









शिक्षक का मन भी कितना भोला,

ज्ञान बाँटता, कभी न डोला।

अपने सपनों को पीछे रखकर,

बच्चों के सपनों को है तोला।


खुद धूप सहकर छाँव है देता,

हर बच्चे को भाव है देता।

बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के खातिर,

अपना सुख भी त्याग है देता।


कभी डाँटता, कभी समझाता,

गलती पर सही राह दिखाता।

जब शिष्य सफलता को छूता,

शिक्षक का मन गर्व से भर जाता।


लेकिन मन में दर्द भी होता,

जब मेहनत का मान न होता।

दिनभर बच्चों को पढ़ाने वाला,

खुद ही कभी परेशान है होता।


न वेतन से सब तौला जाए,

न सेवा का मोल लगाया जाए।

जिस शिक्षक ने राष्ट्र सँवारा,

उसका भी सम्मान बढ़ाया जाए।


शिक्षक केवल नाम नही है,

ज्ञान का कोई दाम नही है।

जिसने अज्ञान मिटाकर जग में,

दीप जलाया—वह आम नही है।


आओ मिलकर मान बढ़ाएँ,

शिक्षक के सपनों को सजाएँ।

शिक्षक के मन की पीड़ा समझें,

और शिक्षा का मान बढ़ाएँ।


क्योंकि शिक्षक खुशहाल रहेगा,

तभी देश खुशहाल बनेगा।

शिक्षक के मन में आशा होगी,

तभी सशक्त राष्ट्र की अभिलाषा होगी।


✍️ डॉ० ललित कुमार चौधरी ( उदयपुर, राजस्थान )

💞 मोहब्बत की सौगात 💞

         बीता है एक लम्हा अभी लम्हा-लम्हा बीतेगी जिंदगी भी पलकों पर सजे हैं जो सपने भर रही हूँ रंग उनमें  कुछ जिन्दगी की हकीकत के कुछ प्रेम ...