विस्मृति के आगोश में, खुद को छोड़ आई थी मैं,
तुमसे मिलकर, अपनी हस्ती मोड़ आई थी मैं।
वो निस्तब्ध रातों का, फोन पर चुपके से बतियाना,
स्मरण है क्या तुम्हें ? या धुंधला गया है वो अफ़साना ?
वो पल, वो क्षण, जैसे स्वप्निल कोई मंज़र था,
मैं और तुम थे बस, बाकी सब मंज़र से बाहर था।
अजीब था हमारे मिलन का वो मौन व्याकरण,
मिले नही कभी, पर बातों में बिताया हर क्षण।
देह की दूरियाँ थी, पर रूहें साथ रहती थी,
धड़कनें शहरों के पार भी, एक-दूजे से बहती थी।
तुमने कहा था— "बिछड़कर मैं भी मरुस्थल हो जाऊँगा,"
"उस नायक की तरह, अपनी हस्ती खो जाऊँगा।"
आज युग बीत गए, नियति की दीवारें खड़ी हैं,
पर न जाने तुम्हारी स्मृतियाँ, किस कोने में पड़ी हैं।
वो अफ़साना ज़माने की नज़रों में, तब भी दफ़न था,
आज भी वह राज, खामोशियों का कफ़न था।
मगर सीने में वो आग, वो तपिश आज भी शेष है,
तुम्हारा वो अधिकार, वो मोह, आज भी विशेष है।
मिट जाने की कसमों से, मैं बहुत डरती थी,
तुम्हें खोने के खौफ में, मैं रोज़ मरती थी।
पर विधि का विधान देखो, कैसा ये न्याय हुआ,
बिछड़ना ही अंततः, हमारा अध्याय हुआ।
मैं तुम्हारी न हो सकी, न अपनी रह पाई,
एक अधूरी प्यास थी, जो समंदर तक ले आई।
वह प्रेम आज भी ज़िंदा है, बस मुकम्मल न हो सका,
अधूरापन ही हमारा, सबसे परम पूज्य सच रहा।
✍️ सुमित्रा कुमारी रजक ( औरंगाबाद, बिहार )






