गुरुवार, सितंबर 24, 2026

👩‍🎓 ईश्वर की अनमोल रचना नारी 👩‍🎓








त्याग की मूर्ति है नारी 

दया की खान है नारी 

शक्ति का वरदान है नारी 

तपती धूप में छांव है नारी 

जीवन का आधार है नारी

धैर्य का प्रतीक है नारी

निःस्वार्थ स्नेह देती नारी

संस्कृति की नींव रखती नारी

 

घर की चारदीवारी को स्वर्ग बना देती है नारी 

चूल्हे से चांद तक की यात्रा करती है नारी 

दुर्गा बन राक्षसों का संहार करती है नारी 

आंसू को हंसी में बदल देती है नारी 

कर्तव्य को प्रतिज्ञा बना लेती है नारी 

घर-आंगन की मुस्कान है नारी

अबला नही सबला है नारी


ईश्वर की अनमोल रचना नारी

हर उलझन सुलझा देती नारी 

अंधेरे में उजाला बन जाती नारी 

अपनी खुशियां भुला देती नारी 

विघ्नों की ढाल बन जाती नारी

नारी में है विशेषता ही विशेषता 

इसलिए सम्मान की अधिकारी है नारी 


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

👩‍💼 तुम लड़की हो……👩‍💼








तुम लड़की हो -

यह कहते ही, 

कितनी निगाहें तौलने लगती हैं तुम्हें, 

रंग से, रूप से, चाल से, कभी हँसी से, 

कभी खामोशी के सवाल से।


कहा जाता है - 

ज़रा धीरे हँसो, ज़रा कम बोलो, 

साँवली हो तो धूप में कम डोलो। 

वज़न थोड़ा कम कर लो,

सपनों को भी थोड़ा थाम कर चलो।


कभी कहते हैं -

इतनी आज़ादी भी अच्छी नही,

इतनी उड़ान भी सच्ची नही।

घर संभालो, करियर भी बनाओ, 

पर अपनी उड़ान को सीमा में ही सजाओ।


तुम लड़की हो -

तो तुम्हारी हर आदत पर चर्चा होगी, 

कभी प्रशंसा, कभी आलोचना की वर्षा होगी।

कपड़ों से चरित्र का अनुमान लगेगा,

ख़ामोशी में भी तुम्हारा बयान गढ़ेगा।


पर कौन समझेगा -

कि तुम केवल चेहरा नही, 

विचार भी हो, तुम केवल देह नही, विस्तार भी हो।

तुम वह स्वप्न हो, जो आकाश को छूता है, 

तुम वह दीप हो, जो अंधकार को रूप देता है।


तुम लड़की हो -

तो तुममें दुर्गा की शक्ति भी है,

सरस्वती की भक्ति भी है।

तुममें लक्ष्मी की समृद्धि की रेखा है,

तुममें सृष्टि रचने वाली हर एक रेखा है।


तुम ही धरती की ममता हो, 

तुम ही जीवन की गरिमा हो।

माँ बनकर तुम संसार सँवारती हो,

अपने आँचल में आकाश उतारती हो।

तुम लड़की हो तुम जीवन बनाती हो।।


✍️ प्रियंका पुष्करणा ( चित्तौड़गढ़, राजस्थान )

🏘️ बेटी ! ये घर अब भी तेरा है 🏘️








कोई तृषा, तो कोई स्नेहा,  

कोई मीना, तो कोई गीता।

कितनी रूपकँवर, 

सूली चढ़ जाती है।

इस दहेज के आड़ में,  

न जाने कितनी गुड़ियाँ, 

झुलस जाती है आग में।

क्यो हर बाप विदा कर देता ?

उसे भेड़ियों के संसार में।  


क्यों पीड़ा न दिखती हर माँ को, 

उस मासूम बच्ची की आवाज में। 

अरे ! मत कहो उससे,

एडजेस्ट कर लो।  

क्यों सिखाते हो सहना हर बार ?

क्यों बुझाते हो चूल्हे पर उसका संसार ?  

क्यों तोलते हो बेटी को रुपयों में ?

क्यों बेच देते हो सपनों को रस्मों में ?  


पर सुन बेटी, एक बात याद रखना,  

ये घर अब भी तुम्हारा है, न हो परेशान।

अगर न रहा जाए तो वापस आ जाना, 

तेरा घर अब भी तेरा है, 

तेरे माँ-बाबा अब भी तेरे हैं।

क्योंकि तू कोई पराई नही,

तू इस घर की जान है, शान है। 

तेरी हँसी से ही ये आँगन महकता है,  

तेरे आँसू से तो ये छत भी दरकता है।


वो भी तो चाहती है खुल के जीना,  

चाँद-सितारों से बातें करना,  

किताबों में अपना नाम लिखना,  

न कि अर्थी पर बस एक नाम मिटना।  

अब बहुत हुआ, अब बस करो,  

दहेज नही, दुआ दो।  

बेटी कोई बोझ नही,  

वो तो घर की रोशनी है,  

उसे जलाओ मत,  

उसे जलने दो, मगर शमाँ बनकर।


✍️ मीनू शर्मा ( सोहन गंज, दिल्ली )

बुधवार, सितंबर 23, 2026

🌻 औरत की महिमा 🌻








किसी के लिए पत्नी, बहन, माई है औरत 

किसी के लिए मौसी, चाची, ताई है औरत।


गैरों के लिए भी मांगती रहती दुआएं,

अपनो की ख़ातिर हुई पराई है औरत।


कंजकों देवियों के रूप में पूजी है जाती,

किसी ने बहकावे में आकर ठुकराई है औरत।


अजनबी से शायरों की ख्वाबों की दुनियां 

पर जालिमों के लिए चंडी कहलाई है औरत।


औरत ही बनती सदा औरत की दुश्मन,

बेशक औरत ही दुनिया में लाई है औरत।


✍️ सुरिंदर अजनबी ( धुरी, पंजाब )

मंगलवार, सितंबर 22, 2026

🌼 भ्रूण हत्या 🌼








मैं अभी इस दुनिया में आई नही हूँ,

फिर मुझसे कैसी नाराज़गी है ?

मैं तो बस एक नन्ही-सी जान हूँ,

फिर मेरी साँसों से कैसी दुश्मनी है ?


माँ, तेरी कोख में पल रही हूँ,

तेरे आँचल का सपना देख रही हूँ,

बाबुल की उँगली थामकर चलने का,

मैं भी तो एक सपना देख रही हूँ।


क्यों कहते हो बेटी बोझ होती है ?

क्यों उसकी किस्मत पहले लिख देते हो ?

जिस बेटी को जन्म से पहले मिटा देते हो,

उसी बेटी के लिए बाद में देवी के दीप जलाते हो।


बेटी ही तो घर में खुशियाँ लाती है,

बेटी ही रिश्तों को प्यार सिखाती है,

बेटी ही एक दिन माँ बनकर,

नई पीढ़ी को जन्म देती है।


मुझे जन्म लेने दो,

मुझे साँस लेने दो,

मैं बोझ नही, एक अवसर हूँ,

मुझे अपने सपनों के साथ जीने दो।


किसी की कोख फिर सूनी न हो,

किसी माँ की आँख नम न हो,

बेटी को जन्म से पहले मारने की

यह क्रूर सोच अब खत्म हो।


बेटी को बचाइए,

उसे पढ़ाइए, आगे बढ़ाइए,

क्योंकि बेटी केवल घर की नही,

पूरे समाज की ताकत है।


✍️ शिखा चंदेल ( देहरादून, उत्तराखंड )

👩‍🎓 औरत 👩‍🎓









मैं कौन हूँ ?

मेरी पहचान क्या है ?

मेरे अस्तित्व का मान क्या है ?

इन प्रश्नों का उत्तर हूँ मैं—

हाँ, मैं औरत हूँ,

मुझे गर्व है कि मैं औरत हूँ।


ईश्वर ने कितने रूपों में,

मुझको नवाज़ा है।

माँ बनाकर ममता का,

सागर मुझमें उतारा है।


बेटी बनकर घर-आँगन की,

खुशियों का वरदान हूँ।

बहन बनकर स्नेह-सुधा,

प्रेम और अनुराग हूँ।


पत्नी बनकर त्याग-समर्पण,

जीवन की सहभागी हूँ।

अर्धांगिनी बनकर हर सुख-दुःख में,

साथ निभाने वाली हूँ।


दुर्गा हूँ तो शक्ति मेरी,

सरस्वती तो ज्ञान,

लक्ष्मी बनकर समृद्धि लाऊँ,

अन्नपूर्णा मेरा मान।


मौन हूँ तो यह मत समझो,

मुझमें कोई आवाज़ नही।

शांत हूँ तो यह मत समझो,

मुझमें कोई आग नही।


अबला समझने की भूल न करना,

मैं शक्ति का विस्तार हूँ,

अन्याय के आगे झुक जाऊँ,

इतनी भी लाचार नही हूँ।


कुत्सित सोच को मैं अब,

साहस से ललकारूँगी।

अपने अधिकार और सम्मान की

हर लड़ाई मैं लड़ूँगी।


न कोई बेटी भय में जीए,

न कोई निर्भया फिर हो।

हर नारी सुरक्षित होकर,

अपने सपनों की अधिकारी हो।


कदम से कदम मिलाकर,

आसमान छू जाऊँगी।

चूल्हे-चौके के संग-संग,

नभ की सैर कर आऊँगी।


प्यार मिले, सम्मान मिले तो,

घर-आँगन महकाऊँगी।

स्नेह मिले तो रिश्तों में,

खुशियों के दीप जलाऊँगी।


पर सम्मान जहाँ नही होगा,

वहाँ मौन नही रहूँगी।

अपने स्वाभिमान की खातिर,

हर बंधन से लड़ जाऊँगी।


मैं केवल किसी की बेटी,

बहन, पत्नी या माँ नही—

इन रिश्तों से आगे भी,

मेरी अपनी पहचान सही।


मैं सृजन हूँ, मैं शक्ति हूँ,

मैं साहस की उड़ान हूँ,

मैं आधी आबादी ही नही,

पूरे समाज की पहचान हूँ।


हाँ, मैं औरत हूँ—

मुझे गर्व है कि मैं औरत हूँ।


✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

💔 मौन विदा की टीस 💔




​




मैं विस्मृत न कर सकी उस आदि-अनंत अनुराग को,

भले ही तुमने मेरी खामोशी को 'बेवफाई' का नाम दे दिया।


मेरा तुम्हें छोड़ जाना, हृदय का विद्रोह नही, काल का प्रतिशोध था,

तुझसे विमुख होना मेरी इच्छा नही, मेरी कुल-मर्यादा का अवरोध था।


​आज भी जब उन स्मृतियों की पगडंडियों पर पाँव रखती हूँ,

तो अतीत की राख से यादों की चिंगारियां रूह को झुलसा देती हैं।


चेतना के पन्नों पर आज भी अंकित है वह चंचल सा परिहास,

जब तुम मेरा परिचय 'भाभी' कहकर, रिश्तों की सीमाओं से खेलते थे—


वही शब्द आज एक अमिट नियति बनकर मेरे वजूद को डस रहा है।

​यकीन मानो, मैं खंडित थी पर पाखंडी नही थी,


मैं वक्त के क्रूर चक्र में फंसी एक ठहरी हुई लाचारी थी।

तुम्हें मझधार में छोड़ना, मेरे प्रेम की पराजय नही,

बल्कि कर्तव्यों की वेदी पर मेरी आत्मा की सबसे बड़ी बलिहारी थी।


​तुमने तो केवल मेरा प्रस्थान देखा है प्रिय,

मेरी रूह का वहीं तुम्हारे पास ठहर जाना नही देखा।।


✍️ सुमित्रा कुमारी रजक ( औरंगाबाद, बिहार )

👩‍🎓 ईश्वर की अनमोल रचना नारी 👩‍🎓

त्याग की मूर्ति है नारी  दया की खान है नारी  शक्ति का वरदान है नारी  तपती धूप में छांव है नारी  जीवन का आधार है नारी धैर्य का प्रतीक है नारी...