Puneet Anupam Group
रचनाकारों, कलाकारों, प्रतिभाशाली लोगों और उत्कृष्ट कार्य करने वाली शख्सियतों को प्रोत्साहित करने का विशेष मंच।
शनिवार, सितंबर 05, 2026
पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित ऑनलाइन ‘सावन सृजन महोत्सव’ के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।
शुक्रवार, सितंबर 04, 2026
🏡 आशियाना 🏡
लोगों के सपनों का महल हमने तैयार किया,
किन्तु जुटा न पाये अपने लिये एक आशियां।
उन्होंने कुंज, घरोंदा और आशियाने से,
उस घर का नामकरण किया।
हमने अपने घर को,
नीली छतरी नाम दिया।
नींव पर पड़े हर नये पत्थर के साथ,
उनकी आशाओं को अपनी मेहनत से खड़ा किया।
जब तक घर पत्थरों का खण्डहर था,
तब तक ही उस पर हमारा आधिपत्य था।
किन्तु सपनों का महल पूरा होते ही,
उसके कर्णधार को उससे बाहर जाना पड़ा।
माना घर, जमीन और भी सब कुछ उन्हीं का था,
किन्तु मत भूलो उनके सपनों को,
हकीकत में हमने ही तासीर किया।
गुजरता हूँ जब कभी अपने ही बनाये दुर्ग से,
सौ बार सोचता हूँ—क्या मैं ही इसका कर्णधार हूँ ?
क्योंकि हर वर्ष की बरसात की तरह,
इस वर्ष भी टपकती रही हमारी छत।
और इतने लोगों के घरों को छत देने वाला,
बदल न सका अपने घर का टूटा छप्पर।
✍️ डॉ० सुनीता डंडरियाल (पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड)
❤️ प्रेम और विश्वास ❤️
प्रेम कोई शब्द नहीं,
जो होंठों से कहा जाए,
प्रेम तो वह एहसास है,
जो ख़ामोशी में भी समझा जाए।
प्रेम है किसी की मुस्कान में
अपनी खुशी तलाश लेना,
उसकी आँखों में छिपे आँसू,
बिन कहे पढ़ लेना।
प्रेम है दूर रहकर भी,
दिल के पास बने रहना,
रिश्तों की भीड़ में,
किसी एक का ख़ास बने रहना।
न वादों की ज़रूरत,
न कसमें, न कोई शर्त,
जहाँ मन निःस्वार्थ हो जाए,
वहीं जन्म लेता है प्रेम।
प्रेम तो वह दीप है
जो आँधियों में भी जलता है,
और सच्चा हो अगर,
तो उम्र भर साथ चलता है।
✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )
गुरुवार, सितंबर 03, 2026
🧩 भाग्य और संघर्ष 🧩
भाग्य प्रत्येक का,
यहाँ भिन्न-भिन्न है।
जिसने जन्म लिया,
इस पृथ्वी पर,
उसे स्वयं ही ज्ञात नही,
उसके भाग्य में क्या है ?
परंतु प्रत्येक जीव-प्राणी,
यहाँ जीवन जीता है।
भाग्य में आने वाली विपत्तियों पर,
कोई शीघ्र ही विजय प्राप्त करता है।
तो कोई नियति से युद्ध करते-करते,
जीवन की कालरात्रि में जीता है।
नियति का यह खेल,
किसी को भी समझ नही आया।
परंतु फिर भी जुझारू,
साहसी व्यक्ति ने,
'भाग्य' को कभी कोसा नही।
✍️ पुजा हरिश्चंद्र धनू ( पालघर, महाराष्ट्र )
🌺 माँ, ममता का दर्पण 🌺
इस पर मेरा जीवन अर्पण है।
माँ तो मूर्त त्याग की है,
सीधे सच्चे अनुराग की है।
माँ शब्द इतना निर्मल है,
जितना स्वच्छ गंगाजल है।
यह एक शब्द है इतना पावन,
ज्यों मंदिर में भगवान है।
इस एक शब्द की महिमा देखो,
अगणित जीवन बलिदान है।
माँ शब्द में इतनी भक्ति है,
तपस्वी की जैसे भक्ति।
माँ तो प्रतीक है प्यार की,
सीधे सच्चे अनुराग की।
माँ ही देती वह ज्ञान है,
जिससे रहते हम अनजान हैं।
माँ शब्द का निष्कर्ष यही है,
मानव का उत्कर्ष यही है।
यह महिमा है उस एक शब्द की,
जो कि अपरम्पार है।
इसी शब्द के कारण देखो,
धरती बनता हर एक परिवार है।
✍️ डॉ० सुनीता डंडरियाल ( पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड )
मंगलवार, सितंबर 01, 2026
🎋 जख्म फिर हरा हुआ है 🎋
दिल को जाने आज क्या हुआ है,
जख्म फिर हरा हुआ है,
किसी के हाथ पर तुम्हारा,
नाम लिखा हुआ है,
जख्म फिर हरा हुआ है।
दर्द में दर्द का एहसास कब हुआ है,
तुम्हारे दिए हुए दर्द से.
दिल भरा हुआ है,
जख्म फिर हरा हुआ है।
मत पूछ उदासी का सबब हमसे,
दबी चिंगारी के भड़कने से,
दिल जला हुआ है,
जख्म फिर हरा हुआ है,
बीते हुए लम्हों को हम भुला न पाए,
यादों का बड़ा वह गट्ठर,
दिल में पड़ा हुआ है,
जख्म फिर हरा हुआ है,
भींगती नही है अब कभी भी आंखें,
यूँ आंखों का सारा पानी,
अंदर भरा हुआ है,
जख्म फिर हरा हुआ है।
✍️ संध्या शर्मा ( मोहाली, पंजाब )
👸 गृहिणी की कहानी 👸
एक नारी के अनेक रूप होते हैं,
हर रूप में वह विशेष होती है,
पर गृहिणी के रूप में,
वह सबसे अव्वल होती है।
सुबह की पहली किरण से पहले उठती,
सबकी जरूरतों का ध्यान रखती,
किसी की माँ, किसी की पत्नी,
किसी की बेटी बनकर रहती।
सबके साथ होते हुए भी,
कभी-कभी स्वयं में अकेली होती है,
सबके चेहरे पर मुस्कान देखकर,
मन ही मन मुस्कुराती है।
कभी गुनगुनाती, कभी चहकती,
घर को अपना संसार समझती,
पर किसी कोने में उसके मन के कुछ
अधूरे सपने भी पलते हैं।
कभी थी अपनी एक पहचान,
अपने सपनों की उड़ान,
अपने स्वाभिमान का अभिमान,
अपने अस्तित्व की अलग पहचान।
फिर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता गया,
समय धीरे-धीरे हाथ से फिसलता गया,
सबको सँवारते-सँवारते वह,
खुद को ही भूलती चली गई।
माँ बनकर ममता लुटाई,
पत्नी बनकर साथ निभाया,
बहू बनकर घर को अपनाया,
हर रिश्ते को दिल से निभाया।
जो देखा, जो सीखा,
उसे अपने जीवन में उतारा,
अपनों की खुशियों के लिए
हर पल खुद को ही सँवारा।
पर कभी किसी ने पूछा —
“तुम्हारी भी कोई चाहत है ?”
कभी किसी ने जानना चाहा —
“तुम्हारे मन की भी कोई आहट है ?”
सबको खुश करने की चाह में,
वह खुद से दूर होती गई,
अपने सपनों की डोर थामे,
चुपचाप कहीं खोती गई।
पर गृहिणी केवल घर की चारदीवारी नही,
वह घर की नींव होती है।
उसके त्याग से घर सँवरता है,
उसकी ममता से हर धड़कन जुड़ी होती है।
अब समय है कि वह अपने सपनों को
फिर से पहचाने,
अपने अस्तित्व को सम्मान दे,
अपनी पहचान फिर से बनाए।
घर भी उसका, सपने भी उसके,
उड़ान भी उसकी, आसमान भी उसका,
वह केवल किसी की माँ या पत्नी नही,
वह स्वयं भी एक संपूर्ण व्यक्तित्व है।
गृहिणी होना उसकी सीमा नही,
यह तो उसके सामर्थ्य की पहचान है,
जो घर को स्वर्ग बना दे,
वह नारी सच में महान है।
✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )
पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित ऑनलाइन ‘सावन सृजन महोत्सव’ के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।
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बन जाते हैं कुछ रिश्ते ऐसे भी जो बांध देते हैं, हमें किसी से भी कुछ रिश्ते ईश्वर की देन होते हैं कुछ रिश्ते हम स्वयं बनाते हैं। बन जाते हैं ...
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पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा लोगों को स्नेह के महत्व और विशेषता का अहसास करवाने के उद्देश्य से ऑनलाइन स्नेह ध्येय सृजन महोत्सव का आयोजन किया गया...
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जीवन में जरूरी हैं रिश्तों की छांव, बिन रिश्ते जीवन बन जाए एक घाव। रिश्ते होते हैं प्यार और अपनेपन के भूखे, बिना ममता और स्नेह के रिश्ते...





