शुक्रवार, अक्टूबर 02, 2026

👩‍💼 ईश्वर का विशेष वरदान है बेटी 👩‍💼








सभ्यता, संस्कृति, संस्कार है बेटी 

जीवन की रौनक, बहार है बेटी

हर मुश्किल का सहारा है बेटी

डूबती किश्ती का किनारा है बेटी

अधिकारों की आवाज़ है बेटी 

मानवता के सिर का ताज है बेटी 


खुशियो की सौगात है बेटी

माँ-बाप की औकात है बेटी

गुरुओं का गुरुर है बेटी 

खुशी का सुरूर है बेटी 

निराशा में आशा है बेटी 

मर्यादा की भाषा है बेटी


कुदरत ने फुर्सत से बनाई है बेटी 

अपने में हर गुण समाई है बेटी 

घर-परिवार की जान है बेटी 

दो कुलों की शान है बेटी

इस युग की नई पहचान है बेटी

ईश्वर का विशेष वरदान है बेटी


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

🌿 नारी, तकदीर बदल सकती है 🌿



 





वो नारी ही है, जो घर-घर की

तकदीर बदल सकती है

उत्तम रचना है कुदरत की

माता कहलाती धरती सी

अबला ना समझो इसको 

यह दुनिया की तस्वीर बदल सकती है

वो नारी ही है, जो घर-घर की

तकदीर बदल सकती है


हाथों में चूड़ियां खनकती है

मेहंदी हाथों की चमकती है

ताकत है उसकी कलाई में

लक्ष्मी बाई बन विपत्ति में

शमशीर पकड़ सकती है

वो नारी ही है, जो घर-घर की

तकदीर बदल सकती है


वे लोग अलग होते होंगे

जो खुद को मजबूत समझते होंगे 

कुछ ऐसे लोग भी होते हैं

जो किस्मत का रोना रोते है 

कभी गृहलक्ष्मी बन, कभी वंश बढ़ाकर 

हाथों की लकीर बदल सकती है

वो नारी ही है, जो घर-घर की

तकदीर बदल सकती है


✍️ संध्या शर्मा ( मोहाली, पंजाब )

🌻 तुम्हारे शब्द अक्सर....🌻









तुम्हारे शब्द अक्सर मन पर घाव कर जाते है

भर आता है दिल लेकिन हम

बस मुस्कुरा कर रह जाते है

लगाकर फूल भी हम काँटों का बाग पाते हैं 

मांगनी पड़ती है हमें, मोहब्बत भी महबूब से

और वो उसमें भी एहसान जताते है


लोग कहते हैं कि 

सीरत की बातें हैं

सूरत नही देखी जाती

अंदर की सुंदरता से ही

दिल जीत लिए जाते हैं

सीरत अच्छी या सूरत

अब भला यह कौन जाने 


कोई कह दे अगर कि तुम काली हो

तो वह नये-नये तरीकों से रूप-रंग संवारेगी 

कोई कह दे अगर कि तुम मोटी हो

तो वह खाना छोड़ देगी

कोई कह दे अगर कि तुम छोटी हो

तो वो हील पहन तुम्हारे कद की बराबरी करेगी

अपने आपको तुम्हारे काबिल बनाने लग जायेगी

तुम्हारी हर कमियों को नज़र अंदाज़ करती 

अपनी हर कमी को सुधारती 

तुम से इतना ऊपर चली जाती हैं कि

उसमे कोई भी कमी नही रहती


तुम क्यूँ हर बार उसमें नुख़्स निकालते हो

क्यूँ तरह-तरह के साँचे में उसे ढालते हो

क्यूँ नही समझा त्याग जो किया उसने तुम्हारे लिए

क्यूँ उसे उसकी नज़रों मे ही नीचे गिराते हो 

तुम समझना ही नही चाहते कि

सुंदरता देह मे नही मन में बसती है

तुम देखना ही नही चाहते कि

प्रेम को उसकी आँखें तरसती है

काश ! तुमने इस चमक-दमक से परे

एक प्रेम की दुनिया देखी होती

काश ! तुम जान पाते कि

हर इक लड़की खूबसूरत होती है


पर तुम तो रह रहे हो अपनी बनाई शर्तों के जाल में

कभी देखो करीब से पहुँच गई है वो किस हाल में

कभी किया है क्या महसूस तुमने एहसास उसके 

कभी देखा है क्या खुद को आईने मे साथ उसके 


देखना कभी गौर से

तुम्हारी हर शर्तों को पूरा करते-करते 

हर बार खुद को बदलते-बदलते

वो स्वयं में सम्पूर्ण नज़र आएगी

और साथ खड़े तुम

हर बार नाक-भौंह सिकोड़े 

खुद को अतृप्त ही पाओगे

वो निखर जाएगी

खुद की नज़रों में एक दिन

और तुम आदतन

कमी ही तलाशते रह जाओगे।


✍️ मीनू शर्मा ( सोहन गंज, दिल्ली )

रविवार, सितंबर 27, 2026

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तरीय ऑनलाइन ‘नारी कल्याणकारी साहित्यिक महोत्सव’ के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा नारी महत्व को दर्शाने व नारी गुणों को नमन करने के उद्देश्य से ऑनलाइन ‘नारी कल्याणकारी साहित्यिक महोत्सव’ का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को नारी से संबंधित दस अलग-अलग विषयों के विकल्प देकर उनमें से किन्हीं दो विषयों का चयन करके चयनित विषयों पर आधारित रचनाएं लिखने के लिए कहा गया। इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों के रचनाकारों ने भाग लिया। जिन्होंने दिए गए विषयों पर आधारित एक से बढ़कर एक उत्कृष्ट रचनाओं के द्वारा नारी गुणों का गुणगान करते हुए महोत्सव की शोभा में चार चाँद लगा दिए और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस महोत्सव में एक ओर जहां वरिष्ठ रचनाकारों ने अपनी विशिष्ट साहित्यिक शैली का प्रदर्शन किया तो दूसरी ओर ग्रुप से जुड़े नवीन रचनाकारों ने भी अपनी अनूठी भावनाओं और विचारों से ग्रुप का ध्यान आकर्षित किया। महोत्सव में सम्मिलित होकर उत्कृष्ट रचनाएं प्रस्तुत करने वाले रचनाकारों को ऑनलाइन 'पुनीत साहित्य श्री' सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ग्रुप के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने संसार की समस्त महिलाओं को कोटि-कोटि नमन करते हुए उनकी सांसारिक उपलब्धियों और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनके निस्वार्थ सहयोग की सराहना की। उन्होंने महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया तथा सम्मान पाने वाली सभी रचनाकार शख्सियतों को उज्ज्वल साहित्यिक जीवन की शुभकामनाएं दी। इसके साथ ही उन्होंने ग्रुप द्वारा आयोजित होने वाले भिन्न-भिन्न ऑनलाइन साहित्यिक कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए रचनाकारों को सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके ग्रुप की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम रागिनी ठाकुर, संध्या शर्मा, सुमित्रा कुमारी रजक, शिखा चंदेल, सुरिंदर अजनबी, रत्ना वाधवानी, मीनू शर्मा, श्रीजी जैन, प्रियंका पुष्करणा रचनाकारों के रहे।

शुक्रवार, सितंबर 25, 2026

🌸 नारी है विशेष 🌸

नारी केवल एक नाम नही, बल्कि ममता, शक्ति, त्याग, साहस और सृजन का अद्भुत संगम है। वह जीवन को जन्म देती है, परिवार को संस्कार देती है और समाज को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए कहा गया है—“नारी है तो सृष्टि है, नारी है तो संसार है।”

नारी के जीवन में अनेक भूमिकाएँ एक साथ जुड़ी होती हैं। वह बेटी बनकर घर में खुशियाँ लाती है, बहन बनकर स्नेह बाँटती है, पत्नी बनकर जीवनसाथी का साथ निभाती है और माँ बनकर अगली पीढ़ी का निर्माण करती है। लेकिन नारी की पहचान केवल इन रिश्तों तक सीमित नही है। आज वह शिक्षिका, डॉक्टर, वैज्ञानिक, अधिकारी, सैनिक, कलाकार, उद्यमी और नेतृत्वकर्ता के रूप में भी अपनी प्रतिभा और क्षमता का परिचय दे रही है।

एक महिला के लिए घर और कार्यक्षेत्र के बीच संतुलन बनाना आसान नही होता। फिर भी वह अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए अपने सपनों को भी पंख देती है। कभी बच्चे की देखभाल करती है, कभी परिवार का सहारा बनती है और कभी अपने पेशे में नई ऊँचाइयाँ हासिल करती है। उसकी यह बहुआयामी भूमिका उसकी विशेषता को और अधिक उजागर करती है।

नारी की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसकी सहनशीलता नही, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को सँवारकर आगे बढ़ने का साहस है। वह कठिनाइयों से टूटने के बजाय उनसे सीखती है और अपने लिए नए रास्ते बनाती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि नारी को केवल सम्मान के शब्द न दिए जाएँ, बल्कि उसे शिक्षा, सुरक्षा, समान अवसर, स्वतंत्र निर्णय और अपने सपनों को पूरा करने का अधिकार भी मिले। किसी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब उसकी बेटियाँ और महिलाएँ आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र और समर्थ हों।

नारी को कमजोर समझना उसकी शक्ति को कम आँकना है। वह कोमल भी है और दृढ़ भी ; ममतामयी भी है और साहसी भी। उसके भीतर एक साथ कई संसार बसते है।

नारी है तो जीवन में ममता है,

नारी है तो रिश्तों में संवेदना है,

नारी है तो समाज में सृजन है,

और नारी है तो भविष्य में उम्मीद है।

नारी विशेष होने के साथ-साथ समाज की विकास-यात्रा की एक महत्वपूर्ण सहभागी है।


नारी है विशेष :- नारी प्रकृति की सबसे सुंदर और अद्भुत रचना है। वह केवल परिवार की आधारशिला ही नहीं, बल्कि समाज और सृष्टि के निर्माण में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। नारी के बिना जीवन की कल्पना अधूरी है। वह अपने प्रेम, ममता, त्याग, साहस और संवेदनशीलता से संसार को सुंदर बनाती है।


सृजन और पालन :- नारी को सृष्टि की सृजनकर्ता कहा जाता है। माँ के रूप में वह एक नए जीवन को जन्म देती है और उसे प्रेम, संस्कार और सुरक्षा देकर बड़ा करती है। परिवार में भी वही प्रेम और अपनापन बनाए रखने वाली मजबूत कड़ी होती है। उसकी गोद बच्चे की पहली पाठशाला होती है और उसके संस्कार जीवनभर उसका मार्गदर्शन करते हैं।


त्याग और सहनशीलता :- नारी के जीवन में त्याग और सहनशीलता का विशेष स्थान है। वह अपने परिवार की खुशियों के लिए अनेक बार अपनी इच्छाओं को पीछे रख देती है। सच ही कहा गया है कि वह स्वयं दीपक की तरह जलकर अपने परिवार के जीवन में उजाला भरती है। उसकी सहनशीलता परिवार को कठिन परिस्थितियों में भी संभालने की शक्ति देती है।


अनेक रूपों में नारी :- नारी का व्यक्तित्व अनेक रिश्तों से सजा है। वह माँ बनकर ममता देती है, बेटी बनकर घर में खुशियाँ लाती है, बहन बनकर स्नेह और अपनापन देती है तथा पत्नी बनकर जीवन की सहयात्री बनती है। हर रूप में उसका प्रेम अलग रंग लिए हुए होता है, लेकिन उसकी संवेदनाएँ हमेशा परिवार को जोड़ने का काम करती हैं।


अबला नही सबला :- आज की नारी केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नही है। वह शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, प्रशासन, सेना, राजनीति, कला, खेल और व्यवसाय जैसे हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही है। वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है। आधुनिक नारी अपने परिवार और करियर के बीच संतुलन बनाते हुए समाज को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।


निष्कर्ष :- नारी केवल किसी रिश्ते का नाम नही, बल्कि प्रेम, शक्ति, त्याग, साहस और सृजन का सुंदर संगम है। जिस समाज में नारी का सम्मान होता है, वह समाज अधिक संवेदनशील और प्रगतिशील बनता है। इसलिए नारी को केवल सम्मान के शब्दों में नही, बल्कि उसके अधिकारों, स्वतंत्रता और समान अवसरों के माध्यम से भी सम्मान देना चाहिए।

नारी सचमुच विशेष है—क्योंकि वह जीवन को जन्म देने के साथ-साथ उसे प्रेम, संस्कार और संवेदना से सँवारने की शक्ति रखती है।


✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

🍁 हर बेटी को जन्म का हक दिलाना है 🍁








माँ के आंचल में आने से पहले ही,

जो कली कुचल दी जाती है।

उस नन्ही अजन्मी चीख से मानवता भी थर्राती है।

क्यों जन्म से पहले बेटी को अभिशाप समझ लिया जाता है ?

सृष्टि के पावन नियम का क्यों गला घोट दिया जाता है ?


वो कहती है "ओ माँ मुझे भी इस दुनिया में आना है"

तेरे आंचल की छांव में मुझे भी मुस्कुराना है। 

भाई जैसा ही प्यार मुझे दो मैं बोझ नही बनूंगी,

तेरे हर सुख-दुख में मैं ढाल बनकर खड़ी रहूंगी।


बेटे की चाहत में क्यों तुम लक्ष्मी का अपमान करते हो,

सृजन की उस कोमल कली का बेरहमी से संहार करते हो,

यदि बेटी ही नही बचेगी जग में तो बहू कहां से लाओगे ?

इस सूनी पड़ती धरती पर फिर वंश कैसे बढ़ाओगे ?


बंद करो यह क्रूर पाप अब रूढ़ियों को तोड़ना होगा,

बेटियों के जीवन का हक अब उनसे नही छीनना होगा।

भ्रूण हत्या को रोक कर हमें नया सवेरा लाना है,

हर बेटी को जन्म का हक और ऊंचा मुकाम दिलाना है।


✍️ श्रीजी जैन ( शाहदरा, दिल्ली )

🪅 लघुकथा - लाल स्याही का डर 🪅

परीक्षा हॉल में पसरे सन्नाटे के बीच अर्चना की कलम कागज़ पर तेज़ी से दौड़ रही थी। 12वीं की यह गणित की परीक्षा उसके भविष्य की इबारत लिखने वाली थी, अचानक, एक ठंडी सिहरन उसके रीढ़ की हड्डी से होकर गुजरी। उसे कुछ अहसास हुआ—एक अनचाहा सा गीलापन। उस अनचाही नमी ने उसकी एकाग्रता को झकझोर कर रख दिया। उसे महसूस हुआ कि उसकी सफ़ेद कुर्ती पर एक लाल रंग धीरे-धीरे फैल रहा है। पल भर में ही वह मेधावी छात्रा एक डरी हुई बच्ची में बदल गई। उसने पीछे मुड़कर नही देखा, पर उसे यकीन था कि पीछे वाली बेंच पर बैठे लड़के ने वह दाग देख लिया होगा। शर्म और घबराहट के एक अजीब से मिश्रण ने उसकी आँखों में आँसू भर दिए। अब उसकी उत्तर-पुस्तिका पर गणित के समीकरणों के बजाय आँसू गिर रहे थे, जिससे नीली स्याही धुंधली होने लगी थी। उसे लग रहा था कि अगर वह अपनी जगह से उठी, तो पूरा हॉल उस पर हँसेगा। वह सुबक रही थी, पर उसकी आवाज़ हलक में ही दबी थी। तभी, शिक्षिका मिसेज रजक की नज़र उस पर पड़ी। उन्होंने देखा कि अर्चना का पेन रुक चुका है और उसका शरीर कांप रहा है। वे शांति से उसके पास आईं और झुककर उसकी बेंच की ओर देखा। स्थिति भांपते ही उनके चेहरे पर न तो कोई झिझक आई और न ही कोई बनावटी गंभीरता। उन्होंने बहुत ही सहजता से अर्चना के कांपते हाथ को थामा और उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा, "बेटा, डरते नही। यह एक बहुत ही सामान्य प्रक्रिया है, कोई अपराध नही। अपनी कॉपी बंद करो और मेरे साथ बाहर आओ।" अर्चना ने हिचकिचाते हुए अपना चेहरा उठाया, उसकी आँखों में ढेर सारी मिन्नतें थीं। मिसेज रजक उसे लेकर पास के वॉशरूम तक गईं और अपने बैग से एक सैनिटरी पैड निकाल कर उसे दिया। उन्होंने अर्चना को पानी पिलाया और बड़े प्यार से उसके बाल संवारते हुए कहा, "अर्चना, यह लाल रंग कोई डरने वाली चीज़ नही है। यह जीवन की निरंतरता का प्रतीक है। इसे अपनी मेहनत पर हावी मत होने देना।" मिसेज रजक ने अपनी शॉल उतारकर अर्चना की कमर पर बांध दी और उसे दोबारा परीक्षा हॉल में ले आईं। जब अर्चना वापस अपनी बेंच पर बैठी, तो उसे लगा कि उसके भीतर का सारा डर उड़ गया है। वह शॉल अब उसके लिए सिर्फ एक कपड़ा नही, बल्कि एक महिला द्वारा दूसरी महिला को दिया गया सम्मान और सुरक्षा का कवच था। अर्चना ने दोबारा पेन उठाया और दोगुने आत्मविश्वास के साथ लिखना शुरू किया। अब उसे अपनी सफ़ेद कुर्ती के दाग की फिक्र नही थी, क्योंकि उसे समझ आ गया था कि समाज की संकुचित सोच से कहीं ऊपर एक शिक्षक की ममता और सहानुभूति होती है। परीक्षा की आखिरी घंटी बजने तक अर्चना ने अपना पेपर पूरा कर लिया था। हॉल से बाहर निकलते वक्त जब उसने मिसेज रजक की ओर देखा, तो उसकी आँखों में अब आँसू नही, बल्कि एक मूक कृतज्ञता और जीत की चमक थी। उसे अहसास हुआ कि दाग कपड़ों पर लगते हैं, हौसलों पर नही।


✍️ सुमित्रा कुमारी रजक ( औरंगाबाद, बिहार )

👩‍💼 ईश्वर का विशेष वरदान है बेटी 👩‍💼

सभ्यता, संस्कृति, संस्कार है बेटी  जीवन की रौनक, बहार है बेटी हर मुश्किल का सहारा है बेटी डूबती किश्ती का किनारा है बेटी अधिकारों की आवाज़ है...