बीता है एक लम्हा अभी
लम्हा-लम्हा बीतेगी जिंदगी भी
पलकों पर सजे हैं जो सपने
भर रही हूँ रंग उनमें
कुछ जिन्दगी की हकीकत के
कुछ प्रेम की अनुभूति के
कभी महक जाती हूँ, कभी सिमट जाती हूँ
तेरे साथ बिताए गए पलों को याद करके
तेरी आँखों से निकलते तीर
मेरे लिए काम देव बन जाते है
खफा होना भी चाहूँ मैं अगर
हर बार ये तीर मेरी हार बन जाते है
मोहब्बत क्या है ये मुझे मालूम नही
मगर तुझसे एक पल की दूरी
मुझे सदियों की सजा लगती हैं
सामने आए तू, तो शायद ना बता पाऊं
मोहब्बत को अपनी ना जता पाऊं
मगर मेरे सीने में हर वक्त तेरी ही तस्वीर रहती है।
हूँ मैं तेरी, दिल की धड़कन ये पल-पल कहती है
तू ही बता अपनी इस तड़प को कहाँ छुपाऊं
भला तेरी मोहब्बत की सौगात को मैं कैसे पाऊं
✍️ अंजुलिका खोखर ( उत्तर पूर्वी, दिल्ली )






